वाल्मीकि रामायण 6.53.32
अङ्गदस्य च वेगेन तद्राक्षसबलं महत् ।प्राकम्पत तदा तत्र पवनेनाम्बुदो यथा॥
aṅgadasya ca vegena tadrākṣasabalaṃ mahat |prākampata tadā tatra pavanenāmbudo yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें