वाल्मीकि रामायण 6.53.7
पताकालङ्कृतं दीप्तं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।रथं प्रदक्षिणं कृत्वा समारोहच्चमूपतिः॥
patākālaṅkṛtaṃ dīptaṃ taptakāñcanabhūṣaṇam |rathaṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā samārohaccamūpatiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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