वाल्मीकि रामायण 6.54.15
बिभेद वानरांस्तत्र सप्ताष्टौ नव पञ्च च ।विव्याध परमक्रुद्धो वज्रदंष्ट्रः प्रतापवान्॥
bibheda vānarāṃstatra saptāṣṭau nava pañca ca |vivyādha paramakruddho vajradaṃṣṭraḥ pratāpavān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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