वाल्मीकि रामायण 6.54.23
समापतन्तं तं दृष्ट्वा रथादाप्लुत्य वीर्यवान् ।गदापाणिरसम्भ्रान्तः पृथिव्यां समतिष्ठत॥
samāpatantaṃ taṃ dṛṣṭvā rathādāplutya vīryavān |gadāpāṇirasambhrāntaḥ pṛthivyāṃ samatiṣṭhata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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