वाल्मीकि रामायण 6.54.26
ततो ऽन्यं गिरिमाक्षिप्य विपुलं द्रुमभूषितम् ।वज्रदंष्ट्रस्य शिरसि पातयामास सो ऽङ्गदः॥
tato 'nyaṃ girimākṣipya vipulaṃ drumabhūṣitam |vajradaṃṣṭrasya śirasi pātayāmāsa so 'ṅgadaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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