वाल्मीकि रामायण 6.54.3
राक्षसाश्चापि मुख्यास्ते रथेषु समवस्थिताः ।नानाप्रहरणाः शूराः प्रायुद्ध्यन्त तदा रणे॥
rākṣasāścāpi mukhyāste ratheṣu samavasthitāḥ |nānāpraharaṇāḥ śūrāḥ prāyuddhyanta tadā raṇe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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