वाल्मीकि रामायण 6.54.6
वानराश्चापि रक्षस्सु गिरीन् वृक्षान् महाशिलाः ।प्रवीराः पातयामासुर्मत्तवारणसन्निभाः॥
vānarāścāpi rakṣassu girīn vṛkṣān mahāśilāḥ |pravīrāḥ pātayāmāsurmattavāraṇasannibhāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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