वाल्मीकि रामायण 6.56.18
अकम्पनस्तु तद्दृष्ट्वा गिरिशृङ्गं समुद्यतम् ।दूरादेव महाबाणैरर्धचन्द्रैर्व्यदारयत्॥
akampanastu taddṛṣṭvā giriśṛṅgaṃ samudyatam |dūrādeva mahābāṇairardhacandrairvyadārayat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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