वाल्मीकि रामायण 6.56.2
क्रोधमूर्च्छितरूपस्तु धून्वन् परमकार्मुकम् ।दृष्ट्वा तु कर्म शत्रूणां सारथिं वाक्यमब्रवीत्॥
krodhamūrcchitarūpastu dhūnvan paramakārmukam |dṛṣṭvā tu karma śatrūṇāṃ sārathiṃ vākyamabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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