वाल्मीकि रामायण 6.56.20
सो ऽश्वकर्णं समासाद्य रोषदर्पान्वितो हरिः ।तूर्णमुत्पाटयामास महागिरिमिवोच्छ्रितम्॥
so 'śvakarṇaṃ samāsādya roṣadarpānvito hariḥ |tūrṇamutpāṭayāmāsa mahāgirimivocchritam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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