वाल्मीकि रामायण 6.56.37
विनेदुश्च यथाप्राणं हरयो जितकाशिनः ।चकर्षुश्च पुनस्तत्र सप्राणानपि राक्षसान्॥
vineduśca yathāprāṇaṃ harayo jitakāśinaḥ |cakarṣuśca punastatra saprāṇānapi rākṣasān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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