वाल्मीकि रामायण 6.56.6
ततः प्रजवनाश्वेन रथेन रथिनां वरः ।हरीनभ्यहनत् क्रोधाच्छरजालैरकम्पनः॥
tataḥ prajavanāśvena rathena rathināṃ varaḥ |harīnabhyahanat krodhāccharajālairakampanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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