वाल्मीकि रामायण 6.58.23
अथ कुम्भहनुस्तत्र तारेणासाद्य वीर्यवान् ।वृक्षेणाभिहतो मूर्ध्नि प्राणान् सन्त्याजयद्रणे॥
atha kumbhahanustatra tāreṇāsādya vīryavān |vṛkṣeṇābhihato mūrdhni prāṇān santyājayadraṇe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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