वाल्मीकि रामायण 6.58.25
आवर्त इव सञ्जज्ञे उभयोः सेनयोस्तदा ।क्षुभितस्याप्रमेयस्य सागरस्येव निस्वनः॥
āvarta iva sañjajñe ubhayoḥ senayostadā |kṣubhitasyāprameyasya sāgarasyeva nisvanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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