वाल्मीकि रामायण 6.58.32
नदीमिव घनापाये हंससारससेविताम् ।राक्षसाः कपिमुख्याश्च तेरुस्तां दुस्तरां नदीम्॥
nadīmiva ghanāpāye haṃsasārasasevitām |rākṣasāḥ kapimukhyāśca terustāṃ dustarāṃ nadīm ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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