वाल्मीकि रामायण 6.58.36
स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठो विकृष्य परमाहवे ।नीलाय व्यसृजद्बाणान् प्रहस्तो वाहिनीपतिः॥
sa dhanurdhanvināṃ śreṣṭho vikṛṣya paramāhave |nīlāya vyasṛjadbāṇān prahasto vāhinīpatiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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