वाल्मीकि रामायण 6.58.37
ते प्राप्य विशिखा नीलं विनिर्भिद्य समाहिताः ।महीं जग्मुर्महावेगा रुषिता इव पन्नगाः॥
te prāpya viśikhā nīlaṃ vinirbhidya samāhitāḥ |mahīṃ jagmurmahāvegā ruṣitā iva pannagāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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