वाल्मीकि रामायण 6.58.44
ततः स चापमुद्गृह्य प्रहस्तस्य महाबलः ।बभञ्ज तरसा नीलो ननाद च पुनःपुनः॥
tataḥ sa cāpamudgṛhya prahastasya mahābalaḥ |babhañja tarasā nīlo nanāda ca punaḥpunaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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