वाल्मीकि रामायण 6.58.50
ततः शोणितदिग्धाङ्गः प्रगृह्य सुमहातरुम् ।प्रहस्तस्योरसि क्रुद्धो विससर्ज महाकपिः॥
tataḥ śoṇitadigdhāṅgaḥ pragṛhya sumahātarum |prahastasyorasi kruddho visasarja mahākapiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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