वाल्मीकि रामायण 6.58.54
सा तेन कपिमुख्येन विमुक्ता महती शिला ।बिभेद बहुधा घोरा प्रहस्तस्य शिरस्तदा॥
sā tena kapimukhyena vimuktā mahatī śilā |bibheda bahudhā ghorā prahastasya śirastadā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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