वाल्मीकि रामायण 6.58.56
प्रभिन्नशिरसस्तस्य बहु सुस्राव शोणितम् ।शरीरादपि सुस्राव गिरेः प्रस्रवणं यथा॥
prabhinnaśirasastasya bahu susrāva śoṇitam |śarīrādapi susrāva gireḥ prasravaṇaṃ yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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