वाल्मीकि रामायण 6.58.58
न शेकुः समरे स्थातुं निहते वाहिनीपतौ ।सेतुबन्धं समासाद्य विकीर्णं सलिलं यथा॥
na śekuḥ samare sthātuṃ nihate vāhinīpatau |setubandhaṃ samāsādya vikīrṇaṃ salilaṃ yathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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