वाल्मीकि रामायण 6.58.7
खड्गशक्त्यृष्टिबाणाश्च शूलानि मुसलानि च ।गदाश्च परिघाः प्रासा विविधाश्च परश्वधाः॥
khaḍgaśaktyṛṣṭibāṇāśca śūlāni musalāni ca |gadāśca parighāḥ prāsā vividhāśca paraśvadhāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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