वाल्मीकि रामायण 6.59.116
विघूर्णमानो निश्चेष्टो रथोपस्थ उपाविशत् ।विसञ्ज्ञो मूर्च्छितश्चासीन्न च स्थानं समालभत्॥
vighūrṇamāno niśceṣṭo rathopastha upāviśat |visañjño mūrcchitaścāsīnna ca sthānaṃ samālabhat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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