वाल्मीकि रामायण 6.59.27
आदित्य इव दुष्प्रेक्षो रश्मिभिर्भाति रावणः ।सुव्यक्तं लक्षये ह्यस्य रूपं तेजस्समावृतम्॥
āditya iva duṣprekṣo raśmibhirbhāti rāvaṇaḥ |suvyaktaṃ lakṣaye hyasya rūpaṃ tejassamāvṛtam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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