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वाल्मीकि रामायण 6.59.42
ततो गवाक्षो गवयः सुदंष्ट्रस्तथर्षभो ज्योतिमुखो नभश्च ।शैलान् समुद्यम्य विवृद्धकायाः प्रदुद्रुवुस्तं प्रति राक्षसेन्द्रम्॥
tato gavākṣo gavayaḥ sudaṃṣṭrastatharṣabho jyotimukho nabhaśca |śailān samudyamya vivṛddhakāyāḥ pradudruvustaṃ prati rākṣasendram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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