वाल्मीकि रामायण 6.59.81
रावणो ऽपि महातेजाः कपिलाघवविस्मितः ।अस्त्रमाहारयामास दीप्तमाग्नेयमद्भुतम्॥
rāvaṇo 'pi mahātejāḥ kapilāghavavismitaḥ |astramāhārayāmāsa dīptamāgneyamadbhutam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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