वाल्मीकि रामायण 6.60.2
मातङ्ग इव सिंहेन गरुडेनेव पन्नगः ।अभिभूतो ऽभवद्राजा राघवेण महात्मना॥
mātaṅga iva siṃhena garuḍeneva pannagaḥ |abhibhūto 'bhavadrājā rāghaveṇa mahātmanā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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