वाल्मीकि रामायण 6.60.93
ततस्ते त्वरितास्तस्य राक्षसा रावणाज्ञया ।मद्यकुम्भांश्च विविधान् क्षिप्रमेवोपहारयन्॥
tataste tvaritāstasya rākṣasā rāvaṇājñayā |madyakumbhāṃśca vividhān kṣipramevopahārayan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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