वाल्मीकि रामायण 6.62.15
हन्त पश्यस्व लङ्कायां वनान्युपवनानि च ।सेतुना सुखमागम्य वानरैकार्णवीकृतम्॥
hanta paśyasva laṅkāyāṃ vanānyupavanāni ca |setunā sukhamāgamya vānaraikārṇavīkṛtam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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