वाल्मीकि रामायण 6.64.15
ज्वलन्तं तेजसा नित्यं क्रोधेन च दुरासदम्।कस्तं मृत्युमिवासह्यमासादयितुमर्हति॥
jvalantaṃ tejasā nityaṃ krodhena ca durāsadam |kastaṃ mṛtyumivāsahyamāsādayitumarhati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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