वाल्मीकि रामायण 6.64.33
रञ्जनीयं हि भर्तारं विनष्टमवगम्य सा।नैराश्यात् स्त्रीलघुत्वाच्च त्वद्वशं प्रतिपत्स्यते॥
rañjanīyaṃ hi bhartāraṃ vinaṣṭamavagamya sā |nairāśyāt strīlaghutvācca tvadvaśaṃ pratipatsyate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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