वाल्मीकि रामायण 6.64.44
गिरिमात्रशरीरस्य शितशूलधरस्य मे ।नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य बिभीयाच्च पुरन्दरः॥
girimātraśarīrasya śitaśūladharasya me |nardatastīkṣṇadaṃṣṭrasya bibhīyācca purandaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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