वाल्मीकि रामायण 6.65.18
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा कुम्भकर्णः समुद्यतः।आददे निशितं शूलं वेगाच्छत्रुनिबर्हणम्॥
rājñastu vacanaṃ śrutvā kumbhakarṇaḥ samudyataḥ |ādade niśitaṃ śūlaṃ vegācchatrunibarhaṇam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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