वाल्मीकि रामायण 6.65.32
भ्रातरं सम्परिष्वज्य कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम्।प्रणम्य शिरसा तस्मै सम्प्रतस्थे महाबलः॥
bhrātaraṃ sampariṣvajya kṛtvā cābhipradakṣiṇam |praṇamya śirasā tasmai sampratasthe mahābalaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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