वाल्मीकि रामायण 6.68.14
यस्य ते वज्रनिष्पेषो न कुर्याद्व्यसनं सदा।स कथं रामबाणार्तः प्रसुप्तो ऽसि महीतले॥
yasya te vajraniṣpeṣo na kuryādvyasanaṃ sadā |sa kathaṃ rāmabāṇārtaḥ prasupto 'si mahītale ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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