वाल्मीकि रामायण 6.69.75
यावदुत्पाटयामासुर्वृक्षान् शैलान् वनौकसः।तावत् प्रासहताः पेतुर्वज्रकृत्ता इवाचलाः॥
yāvadutpāṭayāmāsurvṛkṣān śailān vanaukasaḥ |tāvat prāsahatāḥ peturvajrakṛttā ivācalāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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