वाल्मीकि रामायण 6.74.20
नैव राजनि सुग्रीवे नाङ्गदे नापि राघवे।आर्य सन्दर्शितः स्नेहो यथा वायुसुते परः॥
naiva rājani sugrīve nāṅgade nāpi rāghave |ārya sandarśitaḥ sneho yathā vāyusute paraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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