वाल्मीकि रामायण 6.74.50
स वृक्षषण्डांस्तरसा जहार शैलान् शिलाः प्राकृतवानरांश्च।बाहूरुवेगोद्धतसम्प्रणुन्नास्ते क्षीणवेगाः सलिले निपेतुः॥
sa vṛkṣaṣaṇḍāṃstarasā jahāra śailān śilāḥ prākṛtavānarāṃśca |bāhūruvegoddhatasampraṇunnāste kṣīṇavegāḥ salile nipetuḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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