वाल्मीकि रामायण 6.75.59
जवेनाप्लुत्य च पुनस्तद्बलं रक्षसां महत्।अभ्ययात् प्रत्यरिबलं पतङ्गा इव पावकम्॥
javenāplutya ca punastadbalaṃ rakṣasāṃ mahat |abhyayāt pratyaribalaṃ pataṅgā iva pāvakam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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