वाल्मीकि रामायण 6.77.10
दुरासदश्च सञ्जज्ञे परिघाभरणप्रभः।कपीनां स निकुम्भाग्निर्युगान्ताग्निरिवोत्थितः॥
durāsadaśca sañjajñe parighābharaṇaprabhaḥ |kapīnāṃ sa nikumbhāgniryugāntāgnirivotthitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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