वाल्मीकि रामायण 6.77.21
आत्मानं मोचयित्वा ऽथ क्षितावभ्यवपद्यत।हनुमानुन्ममाथाशु निकुम्भं मारुतात्मजः॥
ātmānaṃ mocayitvā 'tha kṣitāvabhyavapadyata |hanumānunmamāthāśu nikumbhaṃ mārutātmajaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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