वाल्मीकि रामायण 6.77.7
परिघाग्रेण पुस्फोट वातग्रन्थिर्महात्मनः।प्रजज्वाल सघोषश्च विधूम इव पावकः॥
parighāgreṇa pusphoṭa vātagranthirmahātmanaḥ |prajajvāla saghoṣaśca vidhūma iva pāvakaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें