वाल्मीकि रामायण 6.80.1
मकराक्षं हतं श्रुत्वा रावणः समितिञ्जयः।क्रोधेन महता ऽ ऽविष्टो दन्तान् कटकटापयन्॥
makarākṣaṃ hataṃ śrutvā rāvaṇaḥ samitiñjayaḥ |krodhena mahatā ' 'viṣṭo dantān kaṭakaṭāpayan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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