वाल्मीकि रामायण 6.80.10
प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तहाटकसन्निभः।हविस्तत् प्रतिजग्राह पावकः स्वयमुत्थितः॥
pradakṣiṇāvartaśikhastaptahāṭakasannibhaḥ |havistat pratijagrāha pāvakaḥ svayamutthitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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