वाल्मीकि रामायण 6.83.4
ऋक्षाराजस्तथोक्तस्तु स्वेनानीकेन संवृतः।आगच्छत् पश्चिमं द्वारं हनुमान् यत्र वानरः॥
ṛkṣārājastathoktastu svenānīkena saṃvṛtaḥ |āgacchat paścimaṃ dvāraṃ hanumān yatra vānaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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