वाल्मीकि रामायण 6.84.4
राघवं च महात्मानमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम्।ददर्श मोहमापन्नं लक्ष्मणस्याङ्कमाश्रितम्॥
rāghavaṃ ca mahātmānamikṣvākukulanandanam |dadarśa mohamāpannaṃ lakṣmaṇasyāṅkamāśritam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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