वाल्मीकि रामायण 6.84.6
विभीषणमुखं दृष्ट्वा सुग्रीवं तांश्च वानरान्।लक्ष्मणोवाच मन्दार्थमिदं बाष्पपरिप्लुतः॥
vibhīṣaṇamukhaṃ dṛṣṭvā sugrīvaṃ tāṃśca vānarān |lakṣmaṇovāca mandārthamidaṃ bāṣpapariplutaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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