वाल्मीकि रामायण 6.85.25
सन्नद्धः कवची खड्गी सशरो हेमचापधृत्।रामपादावुपस्पृश्य हृष्टः सौमित्रिरब्रवीत्॥
sannaddhaḥ kavacī khaḍgī saśaro hemacāpadhṛt |rāmapādāvupaspṛśya hṛṣṭaḥ saumitrirabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें