वाल्मीकि रामायण 6.85.8
त्वय्यकारणसन्तप्ते सन्तप्तहृदया वयम्।त्यज राजन्निमं शोकं मिथ्या सन्तापमागतम्॥
tvayyakāraṇasantapte santaptahṛdayā vayam |tyaja rājannimaṃ śokaṃ mithyā santāpamāgatam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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